नौरंगिया कविता पाठ की व्याख्या ( Hindi class 9- Summary and short question's answer )

 नौरंगिया  व्याख्या (Explanation) 

(WBBSE Madhyamik Questions and Answers )


 ( Hindi class 9- Summary and short question's answer )

 नौरंगिया कविता का मूल भाव अपने शब्दों में लिखिए।


उत्तर: नौरंगिया शीर्षक कविता में जनवादी कवि कैलाश गौतम ने भारतीय कृषक महिला के जीवन का परिचय दिया है‌। नौरंगिया गंगा पार के रहने वाली है गंगा पार का अंचल दियारा अंचल कहलाता है। उस अंचल के भौगोलिक प्रभाव के कारण वहां के लोग मजबूत और मेहनती होते हैं। लंबी छरहरी कद काठी इस अंचल के निवासियों की अपनी विशेषताए है यह सच है कि भारतीय कृषक परिवार की महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा जुझारू होती हैं कवि ने दर्शाया है कि नौरंगिया देवी देवताओं की कृपा दृष्टि प्राप्त करने की अपेक्षा अपने कर्म पर ज्यादा विश्वास करती है वह बेहद भोली है उसके मन में छल प्रपंच नहीं है लेकिन वह बहुत जुझारू है वह रसूखदार लोगों के आगे घुटने नहीं टेकती है अपने दम पर वह खेती गृहष्थी का सारा काम संभाल लेती है उसका पति आलसी निकम्मा है वह ऐसे कोयले की तरह है जो जलावन की काम नहीं आता ऐसे निकम्मे पति के साथ भी वह शान से जीती है उसके साथ प्रेम पूर्वक जीवन बिताती है।
उसके रूप गुण की चर्चा गांव घर में इस प्रकार होती है कि जैसे अखबार की किसी खास खबर की चर्चा होती है नौरंगिया जवान है इसकी मेहनती देह स्वस्थ और सुंदर है इसका रंग इतना साफ है कि जैसे शीशे के बर्तन में रखा हुआ पानी पारदर्शी दिखता है आम की गुठली से निकला कोमल पत्तियां जैसे हवा में हरदम कांपती रहती है, उसी प्रकार वह हर पल चौकन्नी रहती है। उसके चेहरे पर काले भंवरे की तरह काली लटें खेलते रहती है। पानी से बार-बार धूले चेहरे की तरह उसका चेहरा दमकता रहता है तथाकथित महिलाओं की तरह उसके होठों पर बनावटीपन नहीं है उसके होंठ हरदम खुले रहते थे इसका सौंदर्य देखकर ऐसा लगता है मानो वह विधाता की अनुपम रचना हो ऐसी सुंदरी के सामने समाज की दृष्टि से स्वयं को बचाना सबसे बड़ी चुनौती है लगानवसूलने वाले कर्मचारियों से लेकर ठेकेदार तक उसके पीछे हाथ धोकर पड़े रहते हैं।


अपने काम को निपटाने के लिए वह रात दिन जूठी रहती है। वह काम से कभी हार नहीं मानती है। वह जब तक जागती है लगातार काम करती रहती है। वह जिस परिवेश में पली बड़ी है वहां सांप, गोजर, बिच्छू बिलबिलाते रहते हैं अपनी परिवेश ने उसे इतना साहसी बना दिया है कि उनसे वह बड़ी सहजता से निपट लेती है। उसके हृदय में सौंदर्य बोध भी है वह रेडियो से विविध भारती के संगीत सुनती है। वह सीधी लाठी की तरह सीधे स्वभाव की है। जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण अत्यंत आशावादी है। बड़े उत्साह के साथ त्योहार की तैयारी करती है। नौरंगिया गरीबों में अपना जीवन यापन करती है। उसके घर की मिट्टी की दीवार ढ़ह ढनमना गई है उस पर पुरानी से छप्पर का छाजन है उसकी फसल के तैयार होते ही उसके द्वार पर महाजन वसूली के लिए आ जाते हैं। जीवन के गुजारे के लिए उसके गहने गिरवी पड़े हैं। अपने गिरवी के पड़े गहनों को नहीं छुड़ा पाने के कारण वह मन मसोस कर रह जाती है। उसके जीवन संघर्ष की अंतिम सीमा रेखा कहां पर समाप्त होती है या कोई नहीं बता सकता है उसके सारे अपने सपने साकार होने से पहले ही बिखर गए लेकिन उसने कभी अपना मन मालिन नहीं होने दिया। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी वह मुस्कुराती रहती है । उसके पैरों में किसी की दी हुई चप्पल है उसने कर्ज उधार लेकर अपनी देह पर नई साड़ी पहन रखी है। नौरंगिया के संघर्षपूर्ण जीवन के माध्यम से कवि ने भारतीय कृषक परिवार की महिला की करुण गाथा को अभिव्यक्ति दी है।


नौरंगिया कविता में निहित उद्देश्य को अपने शब्दों में लिखिए

उत्तर  नौरंगिया कविता के माध्यम से कवि ने ग्रामीण जीवन की समस्याओं की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है आजादी की इतने लंबे अरसे गुजर जाने के बाद भी हमारा गांव अभी इस आदिम जीवन को जीने के लिए विवश है कठिन परिश्रम करने पर भी किसान अपनी प्राथमिक आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ है अभी भी हमारे गांव महाजनी सभ्यता के चंगुल में फंसे हुए हैं ऐसा क्यों है? इन प्रश्नों का उत्तर कौन देगा? गरीबों का मसीहा बनने वाली सरकारें या सामाजिक संस्थाएं । कवि ने इन्हीं समस्याओं को इस कविता में उठाने का प्रयास किया है। इस कविता का उद्देश्य व्यवस्था की ओर ध्यान आकृष्ट करना है कि इस अवस्था से गांव को बाहर निकालो, गरीबी के दलदल से गांव को निकालो अन्यथा बड़ी भयंकर स्थिति बनने वाली है।


"नारंगिया गरीब होकर भी स्वाभिमान की प्रतिमूर्ति है" इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: नारंगी शीर्षक कविता में जनवादी कवि कैलाश गौतम ने एक भारतीय कृषक महिला के जीवन का चित्रण किया है नौरंगिया गंगा पार के रहने वाली है वह अत्यंत परिश्रमी, निडर, रूपवती एवं भोली भाली महिला है। वह देवी देवताओं की कृपा दृष्टि प्राप्त करने की अपेक्षा अपने कर्म पर अधिक विश्वास करती है। वह गांव के प्रभावशाली लोगों के आगे घुटने नहीं टेकती है। वह अपने दम पर ही अपनी खेती-गृहस्ती का सारा काम संभालती है। उसका पति आलसी एवं निकम्मा है। फिर भी वह शान से अपना जीवन निर्वाह करती है। वह स्वस्थ एवं सुंदर है। उसका रंग इतना साफ एवं चमकदार है जैसे शीशे के बर्तन में रखा पानी। उसके चेहरे पर कोई बनावटीपन नहीं है। ऐसी सुंदरी के ऊपर समाज के दबंग लोग और लेखपाल से ठेकेदार तक कुदृष्टि लगाए रखते हैं लेकिन किसी के सामने वह आत्मसमर्पण नहीं करती है।

नौरंगिया रात दिन अपने कार्यों को पूरा करने के लिए की जी जान से जूठी रहती है। वह गरीबी में अपना जीवन यापन करती है। उसके घर की मिट्टी के दीवार ढहने वाली है। उस पर छाजन भी पुरानी सी है फिर भी वह महाजनों के सामने गिड़गिड़ाती नहीं है। जबकि जीवन के गुजारे के लिए उसने अपने सारे गहनों को गिरवी रख दिया है। वह प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मुस्कुराती है वह कर्ज उधार लेकर भी अपने तन को ढक लेती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि नौरंगिया गरीब होकर भी स्वाभिमान की प्रतिमूर्ति है।



देवी-देवता नहीं मानती, छक्का-पंजा नहीं जानती

ताकतवर से लोहा लेती, अपने बूते करती खेती,

मरद निखट्टू जनख़ा जोइला, लाल न होता ऐसा कोयला,

उसको भी वह शान से जीती, संग-संग खाती, संग-संग पीती

गाँव गली की चर्चा में वह सुर्ख़ी-सी अख़बार की है

नौरंगिया गंगा पार की है ।

प्रसंग 

प्रस्तुत अंश में एक कर्मठ, साहसी, अविजित, दुर्जय साहस वाली नारी नौरंगिया की चर्चा की गई है। जिसे ईश्वर पर नहीं बल्कि अपने परिश्रम पर भरोसा है ।

व्याख्या

प्रस्तुत अंश में कवि ने दर्शाया है कि नौरंगिया भाग्यवादी नहीं है। वह देवी देवताओं की कृपया दृष्टि प्राप्त करने की अपेक्षा अपने कर्म पर विश्वास करती है। उसके मन में छल प्रपंच नहीं है। वह बेहद भोली है। लेकिन बहुत जुझारू है। वह रसूखदार लोगों के आगे घुटने नहीं टेकती है। वह अपने बलबूते पर खेती-गृहस्ती का सारा काम संभालती उसका पति निकम्मा, नामर्द प्रवृत्ति का है वह ऐसे कोयले की तरह है जो जलावन के काम नहीं आता।  ऐसे निकम्मे पति के साथ वह शान से जीवन यापन करती है। वह उसके साथ प्रेम पूर्वक जीवन बिताती है गांव घर में उसके रूप गुण की चर्चा इस प्रकार होती है जैसे अखबार की किसी खास खबर की चर्चा होती है वह गंगा पार की रहने वाली है।


कसी देह औ’ भरी जवानी शीशे के साँचे में पानी

सिहरन पहने हुए अमोले काला भँवरा मुँह पर डोले

सौ-सौ पानी रंग धुले हैं, कहने को कुछ होठ खुले हैं

अद्भुत है ईश्वर की रचना, सबसे बड़ी चुनौती बचना

जैसी नीयत लेखपाल की वैसी ठेकेदार की है ।

नौरंगिया गंगा पार की है ।

प्रसंग 

प्रस्तुत अंश में एक स्वाभिमानी तथा स्वालंबी नारी नौरंगिया का चारित्रिक विशेषताओं की ओर संकेत किया गया है।

व्याख्या 

नारंगिया  नवयौवना है। उसकी शारीरिक बनावट सुंदर और स्वस्थ है। उसका रंग इतना उज्जवल है जैसे शीशे के बर्तन में रखा हुआ जल पारदर्शी दिखता है। आम की गुठली से निकली हुई लाल लाल कोमल पत्तियां जैसे हवा के हल्के झोंके से कांपती रहती है उसी प्रकार वह अपने काम के प्रति सदैव सचेष्ट रहती है। उसके गोरे मुखड़े पर काली लटें खेलती रहती है, जैसे किसी सुंदर और ताजा फुल पर भवरे मंडराते रहते हैं सौ सौ बार पानी से पखारे गए तरोताजा चेहरे जैसा उसका चेहरा दमकता रहता है। तथाकथित सभ्य महिलाओं की तरह उसके होठों पर कोई बनावटीपन नहीं है। उसके होंठ स्वाभाविक रूप से सदैव खुले रहते हैं। उसके चेहरे का निखार देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि वह विधाता की अनुपम कृति है। ऐसी अनुपम कन्या के सामने समाज की कुत्सित दृष्टि से स्वयं की रक्षा कर पाना सबसे बड़े चुनौती होती है। पटवारी से लेकर ठेकेदार तक उसके प्रति बुरी दृष्टि रखते हैं। गंगा पार की नौरंगिया इन तमाम चुनौतियों चुनौतियों का मुकाबला करती है।


जब देखो तब जाँगर पीटे, हार न माने काम घसीटे

जब तक जागे, तब तक भागे, काम के पीछे, काम के आगे

बिच्छू, गोंजर, साँप मारती, सुनती रहती विविध-भारती

बिल्कुल है लाठी सी सीधी, भोला चेहरा बोली मीठी

आँखों में जीवन के सपने तैय्यारी त्यौहार की है ।

नौरंगिया गंगा पार की है ।

प्रसंग 

प्रस्तुत अंश में नौरंगिया जो इस कविता की केंद्र बिंदु है। उसकी कर्मण्ता की ओर संकेत किया गया है उसके श्रमशीलता बड़ी ही प्रेरणादायक है।

व्याख्या

प्रस्तुत अंश में कवि ने कहा है कि नौरंगिया अपने काम को निपटाने के लिए दिन-रात शारीरिक श्रम करती है। वह काम से कभी हार नहीं मानती हैं। वह जब तक जागती है अपने काम में जुटी रहती है। वह जिस परिवेश में पली बढ़ी है वहां सांप, गोजर, बिच्छू बिलबिलाते रहते हैं। अपने परिवेश ने उसे इतना साहसी बना दिया है कि वह इन कीड़ों मकोड़े से बड़ी साहस से निपट लेती है। उसके अंदर सौंदर्य बोध भी है वह रेडियो से विविध भारती के संगीत सुनती है‌। वह लाठी की तरह सीधे स्वभाव की है। जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण अत्यंत आशावादी है। वह बड़े उत्साह और उल्लास के साथ त्योहार की तैयारी करती है। गंगा पार की नौरंगिया का जीवन उमंग और उल्लास से परिपूर्ण है।



ढहती भीत पुरानी छाजन, पकी फ़सल तो खड़े महाजन

गिरवी गहना छुड़ा न पाती, मन मसोस फिर-फिर रह जाती

कब तक आख़िर कितना जूझे, कौन बताए किससे पूछे

जाने क्या-क्या टूटा-फूटा, लेकिन हँसना कभी न छूटा

पैरों में मंगनी की चप्पल, साड़ी नई उधार की है ।

नौरंगिया गंगा पार की है।

प्रसंग 

प्रस्तुत अंश में ग्रामीण परिवेश के चित्रण के साथ ही साथ सर्वहारा वर्ग की मुसीबतों को संकेतित किया गया है। भारतीय किसान की दुर्दशा की ओर कवि ने संकेत किया है।

व्याख्या

प्रस्तुत अंश में कवि ने कहा है कि नौरंगिया अत्यंत गरीबी में अपना जीवन व्यतीत करती है। उसके घर की मिट्टी की दीवार ढह ढनमना गई है उसे पर पुरानी से छप्पर की छावनी है। उसकी फसल जब पक कर तैयार होती है तो उसके द्वारा वसूली के लिए महाजन आ धमकते हैं। उसके सारे गहने गुरिया गिरवी पड़े हैं अपनी गिरवी पड़े गहनों को नहीं छुड़ा पाने के कारण वह मन मसोस कर रह जाती है। कोई नहीं जानता कि उसके जीवन संघर्ष की सीमा रेखा कहां समाप्त होती है। उसने अपनी सुखद जीवन के लिए न जाने कितने हसीन सपने देखे होंगे, लेकिन उसके सपने साकार होने से पहले ही टूट कर बिखर गए हैं। उसने कभी अपना मन मलिन नहीं किया। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी वह सदा हस्ती मुस्कुराती रहती है। उसके पैरों में किसी की दी हुई पुरानी चप्पल है। उसने कर्ज उधार लेकर अपनी देह पर नई साड़ी पहन रखी है। गंगा पार की नौरंगिया बड़ी जीवट और जीवन्त स्वभाव वाली महिला है।



नौरंगिया पाठ के रचनाकार का नाम लिखिए।
उत्तर: नौरंगिया पाठ के रचनाकार चर्चित कवि एवं गीतकार कैलाश गौतम है।

नौरंगिया कि परिवेश की रचना है?
उत्तर: नौरंगिया ग्रामीण परिवेश की रचना है। जिसमें कवि ने भारतीय किसान की बदहाली का वर्णन किया है।

नौरंगिया का किस में विश्वास नहीं है?
उत्तर: नौरंगिया का देवी देवता में विश्वास नहीं है वह मनुष्य की स्वार्थ लीला एवं छल प्रपंच में भी विश्वास नहीं रखती।

नौरंगिया क्या करती है?
उत्तर: नौरंगिया मूल रूप से खेतबारी का काम करती है। अपने घर गृहस्ती के कार्य में दिन-रात जुटी रहती है।

नौरंगिया के व्यक्तित्व की क्या विशेषता है?
उत्तर: नौरंगिया एक सहज प्रवृत्ति की नारी है जो परिश्रमी, सहनशील एवं सहिष्णु है। उसके अंदर अद्भुत सामंजस्य हैं। निकम्मे पति को भी अपने खस्तेहाल गृहस्थी की तरह ढो रही है।

नौरंगिया किससे लोहा लेने में नहीं हिचकती?
उत्तर: नौरंगिया अपने में मस्त रहने वाली एक स्वाभिमानी एवं निडर नारी है। वह कारों की भाषा नहीं जानती। वह ताकतवर लोगों से लोहा लेती है कमजोर से नहीं।

नौरंगिया का मर्द कैसा था?
उत्तर: नौरंगिया का मर्द निहायत कामचोर, आलसी एवं अकर्मण्य है।

नौरंगिया का दांपत्य जीवन कैसा है?
उत्तर: नौरंगिया ने अपने दांपत्य जीवन में बड़ा ही सामंजस्य बना रखा है। वह अपने आलसी पति के साथ सहजता से जीती है। उसका मान रखती है।

गांव के लोग नौरंगिया को किस दृष्टि से देखते हैं?
उत्तर: गांव के लोग नौरंगिया को बड़े ही आदर एवं सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। इसका सहज सौंदर्य एवं उसकी कर्मठता सभी के लिए आकर्षण का केंद्र है।

गांव-गली में उसकी चर्चा की तुलना कवि ने किससे की है?
उत्तर: कवि ने गांव गली में नौरंगिया की तुलना अखबार की प्रथम पृष्ठ पर छपी सुर्खियों से किया है। अखबार की सुर्खी ही आकर्षण केंद्र होती है।

नौरंगिया के रूप सौंदर्य का वर्णन कीजिए। 
उत्तर: नौरंगिया श्यामा स्वस्थ नारी है। उसके मुखमंडल पर तेज की लाली है। वह सांचे में ढली हुई है। उसकी बड़ी-बड़ी पानीदार आंखें आकर्षण का केंद्र है। 

कवि ने किससे काले भंवरे की तुलना की है?
उत्तर: नौरंगिया के मुखमंडल पर बिखरी घुंघराली काली लटों की तुलना कवि ने भंवर समूह से की है।

नौरंगिया आलोच्य गांव में कहां से आई है?
उत्तर: नौरंगिया आलोच्य गांव में गंगा पार से आई है इसलिए कवि हमें बार-बार स्मरण कराता है की नौरंगिया गंगा पार की है।

नौरंगिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
उत्तर: नौरंगिया एक सुंदर एवं आकर्षक नारी है। उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती है बुरी नजर रखने वाले बड़े लोगों से अपना बचाव करना।

कवि ने लेखपाल एवं ठेकेदार की नियत पर क्यों सवाल उठाया है?
उत्तर: लेखपाल कलम का धनी होता है। वह छल प्रपंच में बड़ा माहिर होता है। ठेकेदार पूंजीपति होता है। वह अपने धन से अप्राप्य वस्तु को भी प्राप्त कर लेता है। इसलिए कवि ने इनकी नियत पर सवाल उठाया है।

जांगर पीटने का क्या तात्पर्य है?
उत्तर: जांगर पीटना एक मुहावरा है जिसका अर्थ है कठिन परिश्रम करना। गरीब आदमी के हिस्से में कठिन परिश्रम करना ही आया है।

नौरंगिया दिन होते ही क्या करने लगती है?
उत्तर: दिन होती नौरंगिया अपने गृहस्थी के काम में जुट जाती है। वह कठोर परिश्रम करती है। उसके जीवन में आलस का कोई स्थान नहीं है।

 नौरंगिया क्या काम से हार मान लेती है?
उत्तर: नहीं, नौरंगिया काम के समक्ष नतमस्तक नहीं होती। उसके सामने कठिन और दुरूह काम भी हार मान लेता है।

किन शब्दों के प्रयोग से ग्रामीण परिवेश का संकेत मिलता है?
उत्तर: कविता में प्रयुक्त बिच्छू, गोजर, सांप, भीत, छाजन आदि शब्दों के प्रयोग से ग्रामीण परिवेश की छलक मिलती है।

विविध भारती क्या है?
उत्तर: विविध भारती आकाशवाणी से प्रसारित होने वाला एक कार्यक्रम इस प्रसारण में विविध प्रकार के गीतों का प्रसारण होता है।

विविध भारती का प्रसारण सुनना नौरंगिया के चरित्र की किस विशेषता को प्रदर्शित करता है?
उत्तर: नौरंगिया के जीवन में सिर्फ काम ही नहीं है वह भी अपने मन को बहलाने के लिए मनोरंजन का सहारा लेती है वह मनोरंजन प्रिया नारी है।

नौरंगिया के स्वभाव के बारे में कवि ने क्या बताया है?
उत्तर: नौरंगिया बड़ी ही सरल एवं सहज स्वभाव की है। वह मृदुभाषिणी है। वह अपनी मीठी बोली से सबके मन को मोह लेती है।

क्या नौरंगिया अपनी स्थिति में संतुष्ट है?
उत्तर: नहीं, नौरंगिया अपनी स्थिति से संतुष्ट नहीं है। उसके मन में भी सुनहरे भविष्य के सपने तैर रहे होते हैं।

क्या नौरंगिया अपने परिश्रम के बल पर अपनी स्थिति सुधरती है?
उत्तर: नहीं, नौरंगिया अपनी परिश्रम से अपनी स्थिति को नहीं सुधर पाई है। उसका टूटा फूटा घर है। वह गिरवी रखे गहने को नहीं छुड़ा सकीं है।

भारतीय नारी के जीवन में सबसे बड़ा आकर्षण क्या होता है?
उत्तर: भारतीय नारी के जीवन में पति के बाद सबसे बड़ा आकर्षण गहनों के प्रति होता है। गहना ही नारी का आभूषण होता है।  

नौरंगिया अपनी गिरवी पड़े गहनों को क्यों नहीं छुड़ा पाती है?
उत्तर: फसल तैयार होते ही महाजन अपना रुपया पाने के लिए छाती पर सवार हो जाते हैं और फसल महाजन के पास चली जाती है इसलिए नौरंगिया गहने नहीं छुड़ा पाती है।

क्या नौरंगिया की हिम्मत जवाब दे चुकी है? 
उत्तर: नहीं, नौरंगिया का श्रम में अटूट विश्वास है वह इसी आशा पर जीवित है कि उसके दिन भी फिरेंगे इसलिए वह हिम्मत नहीं हारती।

क्या नौरंगिया अपने गहनों को ना छुड़ा पाने की पीड़ा से पीड़ित है?
उत्तर: हां, नौरंगिया अपने गहने ना छुड़ा पाने की पीड़ा से पीड़ित है पर यही पीड़ा उसे कर्मठ और अधिक सक्रिय बनाए हुए हैं।

क्या अभाव से जूझते हुए नौरंगिया टूट चुकी है?
उत्तर: नहीं अभाव से जुझते हुए भी नौरंगिया टूटी नहीं है उसके जीवन में पहले ही जैसा हर्षोल्लास है। मानवीय मन की कमजोरियां उस पर हावी नहीं हो सकी है। 

कविता में नौरंगिया के अभावग्रस्त जीवन का संकेत कब मिलता हैं? 
उत्तर: पैरों में मंगनी के चप्पल, साड़ी नई उधार की है। यह पंक्ति नौरंगिया के अभावग्रस्त जीवन की ओर संकेत करती है

नौरंगिया के लिए जीवन क्या है?
उत्तर: नौरंगिया के लिए जीवन एक कठोर साधना है उसे मालूम है कि कठोर साधना से ही सिद्धि मिलती है।

आपके विचार से नौरंगिया क्या है?
उत्तर: मेरे विचार से नौरंगिया गांव गली की व्यथा कथा है ऐसी कथाओं के दर्शन हर जगह होते हैं और हर स्थिति में होते हैं।

हम नौरंगिया को क्यों सलाम करते हैं?
उत्तर: नौरंगिया की संघर्ष कथा उसका दुर्जय साहस और उसके होठों की मुस्कुराहट हमारे लिए अनुकरणीय है इसलिए हम उसे सलाम करते हैं।

नौरंगिया कहां की है?
उत्तर: नौरंगिया गंगा पार की है।

नौरंगिया कौन है?
उत्तर: कविता में जनवादी कवि कैलाश गौतम ने भारतीय कृषक महिला के जीवन का चित्रण किया है। नौरंगिया गांव गली की व्यथा कथा है ऐसी कथाओं के दर्शन हर जगह और हर स्थिति में होते हैं नौरंगिया गंगा पार की रहने वाली भारतीय कृषक महिला है।

लाल ना होता ऐसा कोयला का क्या अर्थ है?
उत्तर: यह एक मुहावरा है जिसका अर्थ जलावन के भी काम ना आने वाले कोयले से है अर्थात अनुपयोगी।

नौरंगिया ने क्या गिरवी रखा था?
उत्तर: नौरंगिया ने अपने गहने गिरवी रखा था।

कैलाश गौतम का जन्म कब और कहां हुआ था?
उत्तर: कैलाश गौतम का जन्म वाराणसी (चंदौली) जनपद के डिग्घी गांव में 8 जनवरी 1944 ई० को हुआ था।


कैलाश गौतम को किन-किन सम्मानों से नवाजा गया था?
उत्तर: कैलाश गौतम को यश भारती, परिवार सम्मान, और ऋतुराज सम्मान से उत्तर प्रदेश सरकार ने सम्मानित किया था।


कैलाश गौतम की चर्चित रचनाओं का नाम लिखिए। उत्तर: कैलाश गौतम की चर्चित रचनाओं में अमोसा का मेला, कचहरी और गांव से भाग कैलाश आदि सर्वाधिक लोकप्रिय रचनाएं हैं।

कवि ने नौरंगिया गंगा पार की आवृति क्यों की है?
उत्तर: अपने कथ्य को प्रभावोत्पादक बनाने के लिए कवि ने कविता में नौरंगिया गंगा पार की वाक्य खंड की आवृत्ति बार-बार की है।

गरीबी की मार सहते हुए भी नौरंगिया क्या करना नहीं भूलती थी?
उत्तर: गरीबी की मार सहते हुए भी नौरंगिया विविध भारती सुनना नहीं भूलती थी।

 नौरंगिया की आंखों में कैसे सपने हैं?
उत्तर नौरंगिया का जीवन के प्रति दृष्टिकोण अत्यंत आशावादी है। उसका मन बहुत ही कोमल है। वह भी अपने मन के अंदर सकुमार सपने संजोए हुए है।


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